Karma Quotes In Hindi | 151+ कर्म पर सुविचार

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Best Karma Quotes In Hindi

कर्म ही मनुष्य के जीवन को पवित्र
और अहिंसक बनाता है।

प्रत्येक कर्म बीज के समान होता है
और जैसा आप बीज बोएंगे वैसा ही फल पाएंगे।

इंसान भाग्यशाली नहीं होता कभी भी जन्म से,
उसका भाग्य बनता है कर्म से।

मुसीबतें चाहे जितनी मर्ज़ी हो हर कदम पर
तू घबरा कर मत बैठ तू बस अपना कर्म कर।

गर्व मत कर अपने धन पर,
अगर कमाई तेरी कुकर्म की है।

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सफल होना चाहते हो तो फल की नहीं
अपने कर्म की चिंता करनी होगी।

भगवान् भी उन्ही का साथ देता है,
जिनके साथ उनके अच्छे कर्म होते हैं।

भगवान् ने हाथ किसी को लकीरें दिखाने के लिए नहीं बल्कि,
अपनी मेहनत का जलवा दिखाने के लिए दिए हैं।

जीवन ख़त्म होने के पश्चात आपका
धर्म क्या है ईश्वर नहीं देखेगा,
ईश्वर बस आपके कर्म देखेगा।

श्रम कीजिए क्रम अनुसार एवं
फल पाइए कर्म अनुसार।

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अपना धर्म निभाने से ज्यादा ज़रूरी
अपने कर्मों को निभाना है।

व्यक्ति की सफलता का कारण
उसका भाग्य नहीं अपितु उसके कर्म होते हैं।

भाग्य आपको मुसीबत से नहीं निकालता
ऐसा करने का साहस केवल आपके कर्मों के पास है।

जीवन का फल कर्मानुसार मिलता है
धर्मानुसार नहीं।

अपने कर्म अच्छे रखना
इस सम्पूर्ण सृष्टि का सबसे बड़ा धर्म है।

जो कर्मठ होता है कर्म से,
उसे आज नहीं तो कल सफलता मिल ही जाती है।

उच्च विचारों से ऊँचे कर्म होते हैं,
और ऊँचे कर्मों से सर्वोच्च सफलता मिलती है।

फल प्राप्ति के लिए केवल सब्र करना आवशयक नहीं है,
अपितु कर्म करना भी आवश्यक है।

दान धर्म करना इस पूरी दुनिया का
सबसे बड़ा कर्म है।

कर्म का सारा दारोमदार अपने कन्धों पर रखो,
और फल का सारा दारोमदार ऊपर वाले पर छोड़ दो।

आपका भाग्य आपका भविष्य बताता है,
परन्तु आपका कर्म आपका भविष्य बनाता है।

आपकी हाथों की रेखाएं आपको वहां तक भेजेगी जहाँ तक उसे जाना है,
परन्तु आपके कर्म आपको वहां तक ले जाएंगे जहाँ आपको जाना है।

अपने भाग्य को भगवान् मत समझिए,
आपका कर्म ही आपकी पूजा है।

व्यक्ति कितना खूबसूरत है यह उसका चेहरा नहीं,
अपितु उसके कर्म बताते हैं।

कर्म जो किसी के भलाई के लिए किये जा रहे हो,
उनका परिणाम कभी भी बुरा नहीं हो सकता।

जो व्यक्ति अच्छे कर्म करने में सक्षम है,
वह हर विकट परिस्तिथि को पार कर जाएगा।

अच्छे कर्मों के फल का बीज देरी से फल को उगाते है,
परन्तु उनका फल अत्यंत पका हुआ एवं मीठा होता है।

इंसान वही श्रेष्ठ है जो बुरी परिस्तिथियों में फिसले नहीं
एवं अच्छी परिस्तिथियों में उछले नहीं।

जब तक जीवन चल रहा है
अच्छे कर्म करते चलिए।

अच्छे कर्मों का मार्ग सीधा
स्वर्ग से जा कर मिलता है।

किस्मत से मिली सफलता तभी तक चलती है
जब तक किस्मत चलती है परन्तु
कर्म से मिली सफलता कभी ख़त्म नहीं होती है।

अच्छे कर्मों का पालन सख्ती से कीजिए,
और अपना स्वभाव हमेशा नरम रखिए।

आप एक बड़े पद पर पहुंच कर विश्व की नज़रों में ऊपर उठ सकते हैं,
परन्तु ईश्वर की नज़रों में ऊँचा वही है जिसके कर्म अच्छे हों।

कदम खुद ब खुद पहुँच जाएंगे सफलता के चरम पर,
अगर हर व्यक्ति बस ध्यान दे अपने कर्म पर।

कर्म और कर्त्तव्य कभी भी अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए
उसे पूरा करना चाहिए।

सफल होना है तो ना परिस्तिथि पर ध्यान दे और ना फल पर,
ध्यान दे तू बस अपने कर्म पर ध्यान दे।

हर व्यक्ति के खासियत उसके गुण और विचार होते हैं,
जो सभी को याद रह जाते हैं चेहरा कुछ दिन ना मिलें
तो सब भूल जाते हैं।

किसी भी कौशल को कंठस्थ करने का सर्वप्रथम उपाय है,
आप स्वयं को कर्मनिष्ठ कर लीजिए।

सही कर्म वह नहीं है जिसके परिणाम हमेशा सही हो,
अपितु वह है जिसका उद्देश्य कभी गलत न हो।

मानव का सबसे बड़ा कर्म एवं धर्म मानवता है,
जो उसे किसी भी हाल में नहीं त्यागनी चाहिए।

दुनिया में प्रेम से बड़ा कोई धर्म नही
और दूसरों की भलाई से बड़ा कोई कर्म नही।

कर्म करने की हिम्मत और सुधार करने की नियत
हो तो इंसान बहुत कुछ कर सकता है।

गुणो और कर्मों से मिली सफलता
ही सच्ची सफलता होती है।

इंसान सब कुछ कापी कर सकता है
लेकिन क़िस्मत और नसीब नही।

तूफ़ान जीवन में सिर्फ़ अस्त–व्यस्त करने नही आते,
कुछ आपकी मंज़िलो के रास्ते साफ़ करने भी आते है।

बदला लेने के लिए समय बर्बाद मत करो।
आपको चोट पहुँचाने वाले लोग अंततः
अपने कर्म का सामना करेंगे।

टूटा हुआ विश्वास और छूटा हुआ बचपन,
ज़िंदगी में दुबारा वापस नही मिलता।दूसरा मौक़ा,
सिर्फ़ कहानियाँ देती है ज़िंदगी नही।

जो व्यक्ति छोटे-छोटे कर्मो को भी ईमानदारी से करता है,
वही बड़े कर्मो को भी ईमानदारी से कर सकता है।

कर्म वह आइना है, जो हमारा स्वरूप हमे दिखा देता है।
अतः हमे कर्म का अहसानमंद होना चाहिए।

क़िस्मत भी उनका साथ देती है
जिनके कर्म मज़बूत होते है।

कर्म वो आइना है
जो हमारा असली चेहरा हमें दिखा देता है।

हर व्यक्ति को उसके कर्म करने की पूरी आज़ादी है
लेकिन कर्म के परिणामों में चुनाव, उसके हाथ में नही।

अच्छे कर्म और अच्छी बातें एक दिन
आपके पास ज़रूर वापिस आती है।

हर किसी को कर्म भोगना पड़ता है
अच्छा या बुरा कर्म की पहचान समय ख़ुद देता है।

शब्दों को जानना और पहचानना काफ़ी नही,
उनका सही इस्तेमाल कर्म का सिद्धांत है।

इंसानियत दिल में होती है हैसियत में नही,
ऊपरवाला कर्म देखता है वसीयत नही।

ईश्वर ना दंड देता है ना माफ़ करता है,
कर्म का फल हमारे सुख दुःख का कारण बनता है।

ज़्यादा समझदार और मूर्ख में कोई फ़र्क़ नही होता,
ये दोनो किसी की नही सुनते।

अगर मनचाही बात हो जाए तो अच्छा है,
ना हो तो और अच्छा है, ईश्वर वही काम पूरा करता है
जो हमारे लिए सही है।

ईमानदार रहें, कर्म की तरह,
यह अंततः आपके पास वापस आ जाएगा।

दूसरों के प्रति दयालु बनें
भले ही वे आपके लिए न हों।

प्यार फैलाते रहें,
भले ही आपको कोई वापस प्यार न दे।

मददगार बनें,
भले ही आपकी मदद करने वाला कोई न हो।

जब कर्म आपको चेहरे पर थप्पड़ मारने के लिए वापस आता है,
तो मैं वहां जाना चाहता हूं। बस इसलिए कि उसे मदद की जरूरत हो।

बदला कभी भी कुछ भी हल नहीं करेगा लेकिन कर्म करेगा।

भाग्य से, संयोग से कुछ नहीं होता।
आप अपने कर्मों से अपना भाग्य खुद बनाते हैं।
वह कर्म है।

जो जाता है वह
वापस आता भी है।

कर्म का कोई मेनू नहीं है।
आपको वह मिलता है जिसके आप हकदार हैं।

जब आप कुछ बुरा करते हैं,
तो यह बाद में आपके पास आता है।

कार्रवाई और प्रतिक्रिया: जैसा कि आप बोते हैं,
वैसा ही आप काटेंगे।

भाग्य हमारे कर्म पर निर्भर करता है।
हर कोई अपने भाग्य के लिए जिम्मेदार है!

किसी दिन लोग मुझसे पूछेंगे कि मेरी सफलता की कुंजी क्या है,
और मैं बस कहूंगा, “अच्छा कर्म”।

कर्म, अगर सीधे शब्दों में कहें,
एक क्रिया है : अच्छा या बुरा।

अच्छे काम बुरे लोग नहीं कर सकते।

आप सभी से छुपा सकते हैं।
लेकिन फिर भी, कर्म आपको देख रहा है।

कर्म अपनी सम्पूर्ण आत्मा से कीजिए,
आपको परमात्मा के दर्शन हो जाएंगे।

जो भी कर्म कीजिए सम्पूर्ण आत्म-विशवास के साथ कीजिए,
अन्यथा उस कर्म को मत कीजिए।

कर्म किस्मत से अत्यधिक बलशाली है,
क्यूंकि इसकी बागडोर आपके स्वयं के हाथ में होती है।

कर्म से कष्ट होगा परन्तु केवल इसी से
आपकी सफलता का मार्ग स्पष्ट होगा।

असंभव कार्य तभी तक असंभव है
जब तक आप उसे संभव करने का प्रयास प्रारम्भ नहीं कर देते हैं।

कुछ नहीं पा सकते तुम शर्म कर,
पर सब कुछ पा सकते हो तुम कर्म कर।

जीवन में ऐसा काम करो कि परिवार,
गुरु और परमात्मा तीनों तुमसे खुश रहें।

जो अपने योग्य कर्म में जी जान से लगा रहता है,
वही संसार में प्रशंसा का पात्र होता है।

काम की अधिकता नहीं,
अनियमितता आदमी को मार डालती है।

महान कार्य शक्ति से नहीं,
अपितु उधम से सम्पन्न होते हैं।

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मनुष्य जन्म से नहीं बल्कि
कर्म से शूद्र या ब्राह्मण होता है।

ईमानदारी और बुद्धिमानी के साथ किया हुआ काम
कभी व्यर्थ नहीं जाता।

जिसने मन को जीत लिया है, उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है,
क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है। ऐसे मनुष्य के लिए सुख-दुख, सर्दी-गर्मी और मान-अपमान एक से है।

जो दान कर्तव्य समझकर, बिना किसी संकोच के,
किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दिया जाए, वह सात्विक माना जाता है।

ईश्वर, ब्राह्मणों, गुरु, माता-पिता जैसे गुरुजनों की पूजा करना तथा पवित्रता,
सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है।

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भगवद गीता के अनुसार नरक के तीन द्वार होते है,
वासना, क्रोध और लालच।

भविष्य का दूसरा नाम है संघर्ष।

हे अर्जुन! परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित है।

हे अर्जुन! जो बहुत खाता है या कम खाता है,
जो ज्यादा सोता है या कम सोता है, वह कभी भी योगी नहीं बन सकता।

जो मुझे सब जगह देखता है और सब कुछ मुझमें देकता है उसके लिए
न तो मैं कभी अदृश्य होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है।

मैं हर जीव के ह्रदय में परमात्मा स्वरुप स्थित हूँ।
जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है,
मैं उसकी श्रद्धा को स्थिर करता हूँ,
जीससे वह उसी विशेष देवता की भक्ति कर सके।

जो महापुरुष मन की सब इच्छाओं को त्याग देता है और अपने
आप ही में प्रसन रहता है, उसको निश्छल बुद्धि कहते है।

जो विद्वान् होते है, वो न तो जीवन के
लिए और न ही मृत के लिए शोक करते है।

हे अर्जुन! जो जीवन के मूल्य को जानता हो।
इससे उच्चलोक की नहीं अपितु अपयश प्राप्ति होती है।

जीवन ना तो भविष्य में है ना अतीत में,
जीवन तो इस क्षण में है।

खुद को जीवन के योग्य बनाना ही
सफलता और सुख का एक मात्र मार्ग है।

हे अर्जुन! जो पुरुष सुख तथा दुख में विचलित नहीं होता
और इन दोनों में समभाव रहता है, वह निश्चित रूप से मुक्ति के योग्य है।

जिस प्रकार मनुष्य पुराने कपड़ो को त्याग कर नये कपड़े धारण करता है,
उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ के शरीरों को त्याग कर नया भौतिक शरीर धारण करता है।

हे अर्जुन! तुम्हारे तथा मेरे अनेक जन्म हो चुके है।
मुझे तो वो सब जन्म याद है लेकिन तुम्हे नहीं।

जो कर्म को फल के लिए करता है,
वास्तव में ना उसे फल मिलता है, ना ही वो कर्म है।

कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

फल की लालसा छोड़कर कर्म करने वाला
पुरुष ही अपने जीवन को सफल बनाता है।

जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह सभी मनुष्यों में
बुद्धिमान है और सब प्रकार के कर्मों में प्रवृत्त रहकर भी दिव्य स्थिति में रहता है।

गुरु दीक्षा बिना प्राणी के सब कर्म निष्फल होते है।

अपने अपने कर्म के गुणों का पालन
करते हुए प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध हो सकता है।

यज्ञ, दान और तपस्या के कर्मों को कभी त्यागना
नहीं चाहिए, उन्हें हमेशा सम्पत्र करना चाहिए।

हे अर्जुन! जो बुद्धि धर्म तथा अधर्म, करणीय तथा
अकरणीय कर्म में भेद नहीं कर पाती, वह राजा के योग्य है।

जो पुरुष न तो कर्मफल की इच्छा करता है,
और न कर्मफलों से घृणा करता है, वह संन्यासी जाना जाता है।

जो मनुष्य अपने कर्मफल प्रति निश्चिंत है और
जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, वहीं असली योगी है।

मनुष्य जो चाहे बन सकता है, अगर वह विश्वास
के साथ इच्छित वस्तु पर लगातार चिंतन करें तो।

मेरा तेरा, छोटा बड़ा, अपना पराया, मन से मिटा दो,
फिर सब तुम्हारा है और तुम सबके हो।

जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है,
जो होगा वो भी अच्छा ही होगा।

अगर कोई प्रेम और भक्ति के साथ मुझे पत्र, फूल,
फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।

जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सबसे अच्छा मित्र है,
लेकिन जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए मन सबसे बड़ा दुश्मन बना रहेगा।

मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यंत प्रिय मित्र हूँ। म
ैं सृष्टि तथा ब्रह्माण्ड, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ।

जब भी और जहाँ भी अधर्म बढ़ेगा।
तब मैं धर्म की स्थापना हेतु, अवतार लेता रहूँगा।

जो लोग निरंतर भाव से मेरी पूजा करते है, उनकी जो आवश्यकताएँ होती है,
उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूँ।

हे अर्जुन! मैं वह काम हूँ, जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।

हे अर्जुन! जो मेरे आविर्भाव के सत्य को समझ लेता है,
वह इस शरीर को छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुनर्जन्म नहीं लेता,
अपितु मेरे धाम को प्राप्त होता है।

हे पार्थ! जिस भाव से सारे लोग मेरी शरण ग्रहण करते है,
उसी के अनुरूप मैं उन्हें फल देता हूँ।

हे अर्जुन! धन और स्त्री सब नाश रूप है।
मेरी भक्ति का नाश नहीं है।

निर्बलता अवश्य ईश्वर देता है किन्तु
मर्यादा मनुष्य का मन ही निर्मित करता है।

डर धारण करने से भविष्य के दुख का निवारण नहीं होता है।
डर केवल आने वाले दुख की कल्पना ही है।

हे कुन्तीपुत्र! मैं जल का स्वाद हूँ, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश हूँ,
वैदिक मन्त्रों में ओंकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ तथा मनुष्य में सामर्थ्य हूँ।

अनेक जन्म के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है,
वह मुझको समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है।
ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ होता है।

हे अर्जुन! श्रीभगवान होने के नाते मैं जो कुछ भूतकाल में घटित हो चुका है,
जो वर्तमान में घटित हो रहा है और जो आगे होने वाला है, वह सब कुछ जानता हूँ। मैं समस्त जीवों को भी जानता हूँ, किन्तु मुझे कोई नहीं जानता।

जो व्यक्ति निरन्तर और अविचलित भाव से भगवान के रूप में
मेरा स्मरण करता है। वह मुझको अवश्य ही पा लेता है।

जो लोग ह्रदय को नियंत्रित नही करते है,
उनके लिए वह शत्रु के समान काम करता है।

जो सब प्राणियों के दुख-सुख को अपने दुख-सुख के समान समझता है
और सबको समभाव से देखता है, वही श्रेष्ठ योगी है।

हे अर्जुन! क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है,
जब बुद्धि व्यग्र होती है, तब तर्क नष्ट हो जाता है,
जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है।

वह किनारे पर बैठा देखता रहा मंजर लहरों का । बहुत सुकून था उन लहरों के शोर में !

कर्म तेरे अच्छे है तोह किस्मत तेरी दासी है , नियत तेरी अच्छी है तोह, घर में मथुरा कशी है

प्यार से बड़ा कोई धर्म नहीं होता । परोपकार से बड़ा कोई कर्म नहीं होता ।।

जिन ज़ख्मों से हम अंजान थे , वो ज़ख्म दे गए ना जो दर्द हमने सहा था , वो तुम भी सह गए ना ? कर्मा

हमारे लिए चींटी से बढ़कर और कोई उपदेशक नहीं है। वह काम करती है और खामोश रहती है।

सहर के इंतजार में है वो, जो अंधेरे से प्यार करते थे। एक मुद्दत से नहीं देखी है, उन आंखों ने रोशनी, जो कभी किसी की आंखों के महताब हुआ करते थे।

कर्म के दर्पण में व्यक्तित्व का प्रतिबिंब झलकता है.

इंसानियत दिल में होती है हैसियत में नही, ऊपरवाला कर्म देखता है वसीयत नही।

उसकी सहायता जरुर कीजिये, जो खुद अपनी सहायता करने में सक्षम नहीं है

अपने कर्म को सलाम करो, दुनियाॅं तुम्हे सलाम करेगी! यदि कर्म को दूषित रखोगे तो, हर किसी को सलाम करना पड़ेगा!

काम करने से पहले सोचना बुद्धिमानी, काम करते हुए सोचना सतर्कता और काम करने के बाद सोचना मूर्खता है.

जो कर्म यज्ञ के लिए किये जाते हैं, उनके अलावा हुए कर्मों से बंधन उत्पन्न हो जाते हैं.

लेने-देने ओर करने योग्य कार्य यदि तुरन्त नहीं कर लिया जाता तो समय उसका रस पी जाता है. -नारायण पंडित

इसे समर्पण कर्तव्य हमारा है… ये हमारी परीक्षा जीवन की… यदि अटल रहा!हे कर्मयोगी… निश्चित ही तेरी विजय होगी…

कोई मेरा बुरा करे वह उसका कर्म है । में किसी का बुरा न करुँ, वो मेरा धर्म है

किसी काम को करने के बारे में जरूरत से ज्यादा सोचना अक्सर उसके बिगड़ जाने का कारण बनता है।

हिसाब रखो आपने अच्छे कर्मों के साथ किये हुये बुरे कर्मों का भी… ईश्वर उसके बदले भी तुम्हें कुछ देगा.!!

ये जरूरी तो नहीं कि इंसान हर रोज मंदिर जाए.. बल्कि कर्म ऐसे होने चाहिए की इंसान जहाॅ भी जाए मंदिर वहीं बन जाए!!

काम करने से पहले सोचना बुद्धिमानी, काम करते हुए सोचना सतर्कता और काम करने के बाद सोचना मूर्खता है

इंसानियत दिल में होती है हैसियत में नही, ऊपरवाला कर्म देखता है वसीयत नही। कर्म करो और फल की चिंता मत करो.

किया हुआ पुरूषार्थ भाग्य का निर्माण करता है. साक्षात ईश्वर भी पुरूषार्थहीन व्यक्ति को कुछ देने के अधिकारी नही होते

इस संसार में कोई मनुष्य स्वभावतः किसी के लिए उदार, प्रिय या दुष्ट नहीं होता। अपने कर्म ही मनुष्य को संसार में गौरव अथवा पतन की ओर ले जाते है।

अगर हमने कभी किसीका बुरा नहीं किया… जिंदगी में कभी किसीका बूरा नहीं चाहा.. तो साहिब दिल कभी नहीं रोयेगा.. क्यूंकि कर्मा कभी नहीं सोता..

ये बात समय रहते ‘जान’ लीजिए। माता पिता ही है हमारे भगवान ये बात आप ‘मान’ लीजिए।। करना है कुछ अच्छा इस जग के लिए ये बात मन मे ‘ठान’ लीजिए।।।

मेरे मालिक बस इतना सा कर्म कर दे। इस दर्द – ए – दिल की सिफारिशें। बस एक तेरे अलावा मुझे । कहीं और ना करनी पड़े।

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